श्री अग्रसेन : राज धर्म

यथा पत्याश्रयो धर्म: स्त्रीणां लोके सनातन: ।

सदैव सा गतिर्नान्या तथाऽस्माकं प्रजाश्रय: ॥

वत्स ! जैसे इस संसार में, स्त्रियों का सनातन धर्म – पति की सेवा पर ही अवलम्बित है, उसीप्रकार प्रजानन ही सदैव हमारे आश्रय हैं। हम लोगों (राजा) के लिये उन (प्रजाजनों) के अतिरिक्त और कोई गति नहीं है।

विशेष: -महाराजा अग्रसेन अपनी संतति को राजधर्म की व्याख्या करते हुए, इस श्‍लोक में निर्देशित करते हैं – कि जिस तरह स्त्रियों का सनातन धर्म है – पति की सेवा करना और उसका आश्रय स्थल, संरक्षक, पालन पोषण कर्ता, पति ही होता है, वैसे ही राजा का स्वरुप, स्त्री की तरह अपने पति स्वरूप प्रजा जनों की सेवा ही है, क्योंकि – प्रजा को तो दूसरा राजा मिल सकता है, किन्तु राजा के लिये तो वह प्रजामात्र ही, उसकी संरक्षक होती है। अत: राजा का धर्म है कि – वह प्रजा की सेवा करे।

अगर, विश्व के राजनीतिज्ञ श्री श्री अग्रसेन जी के राजधर्म को समझ कर उसका अनुकरण करे तो, मानव जगत में लोकोत्तर शांति, समृद्धि तथा मानवता का निश्चित विकास होगा।

 

विश्व के नव निर्माण हेतु

अतः ” अग्रविश्व ट्रस्ट ” ने प्रथम प्रयास स्वरूप श्री अग्रसेन जी के आदर्शों की संचेतना के सकलविश्व में जनजागरण का महत् संकल्प लेकर, विश्व के नव निर्माण हेतु आत्म गौरव जगाने का उपक्रम प्रारंभ किया है।

मानवीय उन्नति के लिये केवल सिद्धातों का उद्घोष या उपदेश ही पर्याप्त नहीं, अपितु आवश्यकता है – इन सिद्धातों के सम्यक परिपालन की। ‘सर्वलोकहितो धर्मः’ जिनका जीवन मंत्र रहा हो ऐसे महामानव श्री अग्रसेन का लोककलणकारी जीवनचरित्र उनके सिद्धातों के सम्यक परिपालन की सहज व स्पष्ट विधि प्रदर्शित करता है। साथ की बौद्धिक, उत्तरदायित्व पूर्ण तथा वैज्ञानिक पद्यति से जीवन जीने की कला सिखाता है।

साथ ही, विश्वास जगाता है – अशांत विश्व की विषम समस्यों का समाधान करते हुए मानव जीवन को सार्थक बनाने के लक्ष्य को पूर्ण करने का।

जिससे मानव जगत में लोकोत्तर शांति, समृद्धि तथा मानवता का निश्चित विकास होगा और जड़ता का अंधकार दूर होकर ”वसुधैव कुटुम्बकम” के भव्य भवन के पुनर्निर्माण का दिव्य स्वप्न साकार होगा, जिससे सकल विश्व का यथार्थ कल्याण होगा।

©- रामगोपाल ‘बेदिल’